
हिंदू समाज प्रारंभ से ही समजातीय रहा है पहले वर्ण व्यवस्था की ही बात थी वर्ण व्यवस्था प्रारंभ में सामाजिक कार्यों के बंटवारे के लिए किया गया था, लेकिन बाद में जो इसमें विकृतियां आयी वो विकृतियां ऐसी थी कि इससे जो विभेद उभरे वह काफी तीखे होते चले गये और समस्या का कारण बनते चले गये. इससे प्रभावित लोगों को वाणी नहीं मिली जब तक राजशाही व्यवस्था थी लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था आते ही लोग बोलने लगे. हमारे संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण का प्रावधान है. हालांकि यह लागू करते समय यह स्पष्टï किया गया था कि ऐसे प्रयास हमेशा के लिए नहीं हो सकते हैं. गैर बराबरी हटाने के लिए ऐसा प्रयास ठीक था लेकिन हमेशा के लिए इसे लागू करना उनके साथ अन्याय करना था जो खुद के सहारे आगे बढऩे की कुव्वत रखते थे. गैर बराबरी हटाने के लिए प्रारंभिक प्रयास जरुरी था. लेकिन इसका राजनीतिक लाभ पाने वाले लोगों ने ऐसा कर दिया कि यह हमारे समाज का परमानेंट फीचर हो गया. लेकिन आरक्षण की व्यवस्था गैर-बराबरी को हटाने के लिए किया गया था लेकिन इसने दूसरे तरह की गैर बराबरी को समाज में प्रस्तुत कर दिया. बाद में बैकवर्ड क्लास कमीशन का गठन हुआ ,उसकी सिफारिशों में भी पिछड़ों को चिन्हित किया गया कि इन्हें आरक्षण् ा दिया जाए. नतीजा यह हुआ कि इन दोनों वर्गों से जैसे अनु.जातियों में से ऐसे वर्ग उभरे जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रुप से सशक्त होकर उभरे. इन्हेांने मौजूदा आरक्षण का खूब लाभ उठाया. कुछ ऐसा ही परिणाम अन्य पिछड़े वर्ग में भी देखने को मिल रहे है. एक बात और है कि अन्य पिछड़े वर्ग में स्वतंत्रता के पूर्व से ही कुछ ऐसी जातियां सम्मिलित है जो सामाजिक रुप से पिछड़ी थी लेकिन आर्थिक रुप से पिछड़ी नहीं थी. लेकिन तब मंडल कमीशन की सिफारिशें आई और उनके मुताबिक उनको पिछड़ा मान लिया गया. पिछड़ों में आज भी ऐसी कई जातियां हंै जो पिछले पचास वर्षों से पिछड़ा होने के बावजूद उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा है. ऐसी ही कमोबेश हालत अनुसूचित जातियों के साथ भी है. इनमें दो-तीन जातियों को छोड़ शेष जातियों को कोई स्पष्टï लाभ नहीं मिल रहा है न तो सामाजिक, आर्थिक और न ही राजनीतिक वह जहां के तहां हंै. इस तरह समाज हमारा बंटा रह ही गया. इसलिए यह कहना कि दलितों में महादलितों की बात करके समाज को बांटने की साजिश हो रही है यह कहना गलत है. यह गैर बराबरी आज भी बनी हुई है. उनके लिए कुछ करना जरुरी था. उसी तरह अत्यंत पिछड़े वर्ग के लोग आज भी अत्यंत पिछड़े है. नतीजा यह होगा कि कि अगर गैर-बराबरी को इसी तरह से चलने दिया गया तो हमारे समाज में और विकृतियां आ सकती है. हमारा सामाजिक जीवन छिन्न-भिन्न हो सकता है. अभी भी इसका प्रभाव देखने में आ सकता है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.
