दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार थी जब जयप्रकाश नारायण का निधन हुआ था. इस खबर के साथ उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास उनके सहयोगियों का जब सुझाव पहुंचा कि राष्टï्रीय शोक घोषित किया जाय तो उनकी प्रतिक्रिया ऐसी हुई जो जनता पार्टी के अन्य नेताओं को स्तब्ध कर गई. अपने ढंग से अपनी बात कहनेवाले मोरारजी भाई ने कहा कि क्या सबको गांधी का दर्जा दिया जा सकता है? चन्द्रशेखर जी उस समय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे. उन्होंने मोरारजी देसाई को कहा कि च्जेपीज् गांधी नहीं थे पर यदि उनके निधन पर राष्टï्रीय शोक घोषित नहीं किया गया तो देश भर में लोग इसे च्जेपीज् के प्रति असम्मान मानेंगे. मैंने जब यह कहानी चन्द्रशेखर जी के एक बड़े निकट सहयोगी से सुनी तो मुझे यह लगा कि मोरारजी भाई राष्टï्रीय सम्मान के योग्य केवल उन्हीं लोगों को समझते थे जो राजनीति के माध्यम से किसी कुर्सी तक पहुंचे हों. उनकी राय में कोई अन्य ऐसे सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता था. गांधी एक अपवाद थे. मैं नहीं कह सकता कि राष्टï्रीय शोक के सवाल पर मोरारजी भाई की राय के बारे में जो कहानी मुझे बताई गई वह कितनी सही थी. पर हाल ही में बिहार के मानव संसाधन सचिव डा. मदन मोहन झा के निधन पर इस संदर्भ में जो विवाद हुआ उससे लगता है कि बड़ी संख्या में लोग आज भी यही मानते हैं कि केवल राजनेता ही ऐसे सम्मान के अधिकारी हो सकते और अन्य लोगों के निधन पर शोक व्यक्त करना उनके परिवार के लोगों तक ही सीमित रहना चाहिए चाहे उनका योगदान किसी क्षेत्र में-शिक्षा, संस्कृति, कला, साहित्य - में कितना भी महत्वपूर्ण रहा हो. प्रश्न यह है कि राष्टï्रीय शोक के सरकारी निर्णय के बाद होता क्या है? शोक मनाते हुए अपना काम काज बंद रखने की विवशता उन लोगों पर भी थोप दी जाती है जो उस व्यक्ति के बारे में अधिक नहीं जानते जिसके लिए शोक मनाया जा रहा है. राष्टï्रीय शोक मनाने की परम्परा किस आधार पर टिकी है? महज एक चुनाव जीत जाने और संयोगवश मंत्री बन जाने से ही जन-प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले व्यक्ति तक ही यह सम्मान क्यों सीमित रहे? एक जन सेवक - पब्लिक सर्वेंट - जो जीवन के तीस-पैंतीस वर्ष राज्य की सेवा करता रहा हो उसे ऐसा सम्मान क्यों नहीं मिलना चाहिए? सिर्फ इसीलिए कि वह वेतन पाता है और वेतन पानेवाला च्च्बाबूज्ज् किसी और सम्मान का अधिकारी नहीं है. आखिर वह सुविधा-भोगी होने के लिए ही तो बाबू बना था. यह तर्क कितना लचर है यह इसी बात से स्पष्टï हो जाती है कि अपने को जन-प्रतिनिधि कहने वाले लोगों ने अपने लिए जिन सुविधाओं की व्यवस्था कर ली है और शायद आगे भी करते रहेंगे वे इन च्च्बाबूओंज्ज् को कभी नहीं मिल सकती हैं और न मिली है. मृतकों के सम्मान की हमारी अपनी सामाजिक व्यवस्था है. हिन्दु मृत के लिए तर्पण और पिंड दान करते हैं और जो इस कर्मकांड में विश्वास नहीं करते वे भी कम-से-कम इतना तो अवश्य मानते है कि मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार सम्मान के साथ किया जाना चाहिए. मुसलमान मानते हैं कि मरे को गुसल और कफन देकर दुआओं के साथ दफन करना जमात की जिम्मेदारी होती है. ऐसे विश्वास और मूल्यों में श्रद्घा होने के बावजूद हम ऐसा क्यों करते हैं जिससे यह बताया जा सके कि मरने के बाद भी एक छोटा है और दूसरा बड़ा है.
संभव है वर्तमान सरकारी नियमों में शोक मनाने की काई खास व्यवस्था हो. यह भी संभव है ऐसी व्यवस्था के पीछे कोई तर्क भी हो. पर यदि व्यवस्था में उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं है जिन्होंने जनमानस में अपने लिए जगह बनाई हो तो इस व्यवस्था में परिवर्तन पर विचार किया जाना चाहिए.
Sunday, May 10, 2009
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