Wednesday, May 13, 2009

क्या इससे समाज बंट जायेगा!


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


हिंदू समाज प्रारंभ से ही समजातीय रहा है पहले वर्ण व्यवस्था की ही बात थी वर्ण व्यवस्था प्रारंभ में सामाजिक कार्यों के बंटवारे के लिए किया गया था, लेकिन बाद में जो इसमें विकृतियां आयी वो विकृतियां ऐसी थी कि इससे जो विभेद उभरे वह काफी तीखे होते चले गये और समस्या का कारण बनते चले गये. इससे प्रभावित लोगों को वाणी नहीं मिली जब तक राजशाही व्यवस्था थी लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था आते ही लोग बोलने लगे. हमारे संविधान में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के आरक्षण का प्रावधान है. हालांकि यह लागू करते समय यह स्पष्टï किया गया था कि ऐसे प्रयास हमेशा के लिए नहीं हो सकते हैं. गैर बराबरी हटाने के लिए ऐसा प्रयास ठीक था लेकिन हमेशा के लिए इसे लागू करना उनके साथ अन्याय करना था जो खुद के सहारे आगे बढऩे की कुव्वत रखते थे. गैर बराबरी हटाने के लिए प्रारंभिक प्रयास जरुरी था. लेकिन इसका राजनीतिक लाभ पाने वाले लोगों ने ऐसा कर दिया कि यह हमारे समाज का परमानेंट फीचर हो गया. लेकिन आरक्षण की व्यवस्था गैर-बराबरी को हटाने के लिए किया गया था लेकिन इसने दूसरे तरह की गैर बराबरी को समाज में प्रस्तुत कर दिया. बाद में बैकवर्ड क्लास कमीशन का गठन हुआ ,उसकी सिफारिशों में भी पिछड़ों को चिन्हित किया गया कि इन्हें आरक्षण् ा दिया जाए. नतीजा यह हुआ कि इन दोनों वर्गों से जैसे अनु.जातियों में से ऐसे वर्ग उभरे जो राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक रुप से सशक्त होकर उभरे. इन्हेांने मौजूदा आरक्षण का खूब लाभ उठाया. कुछ ऐसा ही परिणाम अन्य पिछड़े वर्ग में भी देखने को मिल रहे है. एक बात और है कि अन्य पिछड़े वर्ग में स्वतंत्रता के पूर्व से ही कुछ ऐसी जातियां सम्मिलित है जो सामाजिक रुप से पिछड़ी थी लेकिन आर्थिक रुप से पिछड़ी नहीं थी. लेकिन तब मंडल कमीशन की सिफारिशें आई और उनके मुताबिक उनको पिछड़ा मान लिया गया. पिछड़ों में आज भी ऐसी कई जातियां हंै जो पिछले पचास वर्षों से पिछड़ा होने के बावजूद उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा है. ऐसी ही कमोबेश हालत अनुसूचित जातियों के साथ भी है. इनमें दो-तीन जातियों को छोड़ शेष जातियों को कोई स्पष्टï लाभ नहीं मिल रहा है न तो सामाजिक, आर्थिक और न ही राजनीतिक वह जहां के तहां हंै. इस तरह समाज हमारा बंटा रह ही गया. इसलिए यह कहना कि दलितों में महादलितों की बात करके समाज को बांटने की साजिश हो रही है यह कहना गलत है. यह गैर बराबरी आज भी बनी हुई है. उनके लिए कुछ करना जरुरी था. उसी तरह अत्यंत पिछड़े वर्ग के लोग आज भी अत्यंत पिछड़े है. नतीजा यह होगा कि कि अगर गैर-बराबरी को इसी तरह से चलने दिया गया तो हमारे समाज में और विकृतियां आ सकती है. हमारा सामाजिक जीवन छिन्न-भिन्न हो सकता है. अभी भी इसका प्रभाव देखने में आ सकता है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

Sunday, May 10, 2009

क्या राजनीतिक कुर्सी ही सबकुछ है आज!

दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार थी जब जयप्रकाश नारायण का निधन हुआ था. इस खबर के साथ उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के पास उनके सहयोगियों का जब सुझाव पहुंचा कि राष्टï्रीय शोक घोषित किया जाय तो उनकी प्रतिक्रिया ऐसी हुई जो जनता पार्टी के अन्य नेताओं को स्तब्ध कर गई. अपने ढंग से अपनी बात कहनेवाले मोरारजी भाई ने कहा कि क्या सबको गांधी का दर्जा दिया जा सकता है? चन्द्रशेखर जी उस समय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे. उन्होंने मोरारजी देसाई को कहा कि च्जेपीज् गांधी नहीं थे पर यदि उनके निधन पर राष्टï्रीय शोक घोषित नहीं किया गया तो देश भर में लोग इसे च्जेपीज् के प्रति असम्मान मानेंगे. मैंने जब यह कहानी चन्द्रशेखर जी के एक बड़े निकट सहयोगी से सुनी तो मुझे यह लगा कि मोरारजी भाई राष्टï्रीय सम्मान के योग्य केवल उन्हीं लोगों को समझते थे जो राजनीति के माध्यम से किसी कुर्सी तक पहुंचे हों. उनकी राय में कोई अन्य ऐसे सम्मान का अधिकारी नहीं हो सकता था. गांधी एक अपवाद थे. मैं नहीं कह सकता कि राष्टï्रीय शोक के सवाल पर मोरारजी भाई की राय के बारे में जो कहानी मुझे बताई गई वह कितनी सही थी. पर हाल ही में बिहार के मानव संसाधन सचिव डा. मदन मोहन झा के निधन पर इस संदर्भ में जो विवाद हुआ उससे लगता है कि बड़ी संख्या में लोग आज भी यही मानते हैं कि केवल राजनेता ही ऐसे सम्मान के अधिकारी हो सकते और अन्य लोगों के निधन पर शोक व्यक्त करना उनके परिवार के लोगों तक ही सीमित रहना चाहिए चाहे उनका योगदान किसी क्षेत्र में-शिक्षा, संस्कृति, कला, साहित्य - में कितना भी महत्वपूर्ण रहा हो. प्रश्न यह है कि राष्टï्रीय शोक के सरकारी निर्णय के बाद होता क्या है? शोक मनाते हुए अपना काम काज बंद रखने की विवशता उन लोगों पर भी थोप दी जाती है जो उस व्यक्ति के बारे में अधिक नहीं जानते जिसके लिए शोक मनाया जा रहा है. राष्टï्रीय शोक मनाने की परम्परा किस आधार पर टिकी है? महज एक चुनाव जीत जाने और संयोगवश मंत्री बन जाने से ही जन-प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले व्यक्ति तक ही यह सम्मान क्यों सीमित रहे? एक जन सेवक - पब्लिक सर्वेंट - जो जीवन के तीस-पैंतीस वर्ष राज्य की सेवा करता रहा हो उसे ऐसा सम्मान क्यों नहीं मिलना चाहिए? सिर्फ इसीलिए कि वह वेतन पाता है और वेतन पानेवाला च्च्बाबूज्ज् किसी और सम्मान का अधिकारी नहीं है. आखिर वह सुविधा-भोगी होने के लिए ही तो बाबू बना था. यह तर्क कितना लचर है यह इसी बात से स्पष्टï हो जाती है कि अपने को जन-प्रतिनिधि कहने वाले लोगों ने अपने लिए जिन सुविधाओं की व्यवस्था कर ली है और शायद आगे भी करते रहेंगे वे इन च्च्बाबूओंज्ज् को कभी नहीं मिल सकती हैं और न मिली है. मृतकों के सम्मान की हमारी अपनी सामाजिक व्यवस्था है. हिन्दु मृत के लिए तर्पण और पिंड दान करते हैं और जो इस कर्मकांड में विश्वास नहीं करते वे भी कम-से-कम इतना तो अवश्य मानते है कि मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार सम्मान के साथ किया जाना चाहिए. मुसलमान मानते हैं कि मरे को गुसल और कफन देकर दुआओं के साथ दफन करना जमात की जिम्मेदारी होती है. ऐसे विश्वास और मूल्यों में श्रद्घा होने के बावजूद हम ऐसा क्यों करते हैं जिससे यह बताया जा सके कि मरने के बाद भी एक छोटा है और दूसरा बड़ा है.
संभव है वर्तमान सरकारी नियमों में शोक मनाने की काई खास व्यवस्था हो. यह भी संभव है ऐसी व्यवस्था के पीछे कोई तर्क भी हो. पर यदि व्यवस्था में उन लोगों के लिए कोई जगह नहीं है जिन्होंने जनमानस में अपने लिए जगह बनाई हो तो इस व्यवस्था में परिवर्तन पर विचार किया जाना चाहिए.